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Vishnu Sahasranamam Lyrics | Vishnu Sahasranamam pdf

Vishnu Sahasranamam Lyrics In Hindi– विष्णुसहस्त्रनाम वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण विधिरूप धर्म तथा पापका क्षय करनेवाले धर्मरहस्योंको सब प्रकार सुनकर शान्तनुपुत्र भीष्मसे फिर पूछा । युधिष्ठिर बोले- समस्त जगत्में एक ही देव कौन हैं ? तथा इस लोकमें एक ही परम आश्रयस्थान कौन है ? जिसका साक्षात्कार कर लेनेपर जीवकी अविद्यारूप हृदयग्रन्थि टूट जाती है , सब संशय नष्ट हो जाते हैं तथा सम्पूर्ण कर्म क्षीण हो जाते हैं । किस देवकी स्तुति – गुण – कीर्तन करनेसे तथा किस देवका नाना प्रकारसे बाह्य और आन्तरिक पूजन करनेसे मनुष्य कल्याणकी प्राप्ति कर सकते हैं ?

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आप | समस्त धर्मोंमें पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त किस धर्मको परम श्रेष्ठ मानते हैं ? तथा किसका जप करनेसे जननधर्मा जीव जन्ममरणरूप संसार – बन्धनसे मुक्त हो जाता है । 2 भीष्मजीने कहा – स्थावर जंगमरूप संसारके स्वामी , ब्रह्मादि देवोंके देव , देश , काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न , क्षर – अक्षरसे श्रेष्ठ पुरुषोत्तमका सहस्र नामोंके द्वारा निरन्तर तत्पर रहकर गुण – संकीर्तन करनेसे पुरुष सब दुःखोंसे पार विनाशरहित पुरुषका सब समय भक्तिसे युक्त होकर पूजन करनेसे , उसीका ध्यान करनेसे तथा पूर्वोक्त प्रकारसे सहस्रनामोंके द्वारा स्तवन एवं नमस्कार पूजा करनेवाला सब दुःखोंसे छूट जाता है ।

उस जन्म – मृत्यु आदि छ : भावविकारोंसे रहित , सर्वव्यापक , सम्पूर्ण लोकोंके महेश्वर , लोकाध्यक्ष देवकी निरन्तर स्तुति करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे पार हो जाता है । जगत्की रचना करनेवाले ब्रह्माके तथा ब्राह्मण , तप और श्रुतिके हितकारी , सब धर्मोंको जाननेवाले , प्राणियोंकी कीर्तिको ( उनमें अपनी शक्तिसे प्रविष्ट होकर ) बढ़ानेवाले , सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी , समस्त भूतोंके उत्पत्ति – स्थान एवं संसारके कारणरूप परमेश्वरका स्तवन करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे छूट जाता है ।

विधिरूप सम्पूर्ण धर्मोंमें मैं इसी धर्मको सबसे बड़ा मानता हूँ कि मनुष्य अपने हृदयकमलमें विराजमान कमलनयन भगवान् वासुदेवका भक्तिपूर्वक तत्परतासहित गुण – संकीर्तनरूप स्तुतियोंसे सदा अर्चन करे । जो देव परम तेज , परम तप , परम ब्रह्म और परम परायण है , वही समस्त प्राणियोंकी परम गति है ।

पृथ्वीपते ! जो पवित्र करनेवाले तीर्थादिकोंमें परम पवित्र है , मंगलोंका मंगल है , देवोंका देव है तथा जो भूत – प्राणियोंका अविनाशी पिता है , कल्पके आदिमें जिससे सम्पूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं और फिर युगका क्षय होनेपर महाप्रलयमें जिसमें वे विलीन हो जाते हैं , उस लोकप्रधान , संसारके स्वामी , भगवान् विष्णुके पाप और संसारभयको दूर करनेवाले हजार नामोंको मुझसे सुन । जो नाम गुणके कारण प्रवृत्त हुए हैं , उनमेंसे जो – जो प्रसिद्ध हैं और मन्त्रद्रष्टा मुनियों द्वारा जो जहाँ – तहाँ सर्वत्र भगवत्कथाओंमें गाये गये हैं |

उस अचिन्त्यप्रभाव महात्माके उन समस्त नामोंको पुरुषार्थ – सिद्धिके लिये वर्णन करता हूँ ।

Vishnu Sahasranamam pdf

ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप

  1. विश्वम्– समस्त
  2. विष्णुः – सर्वव्यापी , जगत्के कारणरूप
  3. वषट्कारः – जिनके उद्देश्यसे यज्ञमें वषट् क्रिया की जाती है , ऐसे यज्ञस्वरूप
  4. भूतभव्यभवत्प्रभुः – भूत , भविष्यत् और वर्तमानके स्वामी
  5. भूतकृत्– इ रजोगुणका आश्रय लेकर ब्रह्मारूपसे सम्पूर्ण भूतोंकी रचना करनेवाले
  6. भूतभृत् – सत्त्वगुणका आश्रय लेकर सम्पूर्ण भूतोंका पालन – पोषण करनेवाले
  7. भाव : – नित्यस्वरूप होते हुए भी स्वतः उत्पन्न होनेवाले
  8. भूतात्मा– सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा अर्थात् अन्तर्यामी
  9. भूतभावनः – भूतोंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाले ।
  10. पूतात्मा – पवित्रात्मा
  11. परमात्मा परमश्रेष्ठ नित्य – शुद्ध – बुद्ध – मुक्तस्वभाव
  12. मुक्तानां परमा गतिः – मुक्त पुरुषोंकी सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप
  13. अव्ययः – कभी विनाशको प्राप्त न होनेवाले
  14. पुरुष : – पुर अर्थात् शरीरमें शयन करनेवाले
  15. साक्षी – बिना किसी व्यवधानके सब कुछ देखनेवाले
  16. क्षेत्रज्ञः – क्षेत्र अर्थात् समस्त प्रकृतिरूप शरीरको पूर्णतया जाननेवाले
  17. अक्षरः – कभी क्षीण न होनेवाले ।
  18. योगः – मनसहित सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंके निरोधरूप योगसे प्राप्त होनेवाले
  19. योगविदां नेता: योगको जाननेवाले भक्तोंके योगक्षेमादिका निर्वाह करनेमें अग्रसर रहनेवाले
  20. प्रधानपुरुषेश्वरः – प्रकृति और पुरुषके स्वामी
  21. नारसिंहवपुः – मनुष्य और सिंह दोनोंके – जैसा शरीर धारण करनेवाले , नरसिंहरूप
  22. श्रीमान्– वक्षःस्थलमें सदा श्रीको धारण करनेवाले
  23. केशवः – ( क ) ब्रह्मा , ( अ ) विष्णु और ( ईश ) महादेव – इस प्रकार त्रिमूर्ति स्वरूप
  24. पुरुषोत्तम : -क्षर और अक्षर इन दोनों में सर्वथा उत्तम ।
  25. सर्वः – असत् और सत् – सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान
  26. शर्वः – सारी प्रजाका प्रलयकालमें संहार करनेवाले
  27. शिवः – तीनों गुणोंसे परे कल्याणस्वरूप
  28. स्थाणुः – स्थिर ,
  29. भूतादिः – भूतोंके आदि कारण
  30. निधिरव्ययः– प्रलयकालमें सब प्राणियोंके लीन होनेके अविनाशी स्थानरूप
  31. सम्भवः – अपनी इच्छासे भली प्रकार प्रकट होनेवाले
  32. भावन : समस्त भोक्ताओंके फलोंको उत्पन्न करनेवाले
  33. भर्ता– सबका भरण करनेवाले , ३४ प्रभवः – उत्कृष्ट ( दिव्य ) जन्मवाले
  34. प्रभुः – सबके स्वामी
  35. ईश्वरः – उपाधिरहित ऐश्वर्यवाले ।
  36. स्वयम्भूः – स्वयं उत्पन्न होनेवाले
  37. शम्भुः – भक्तोंके लिये सुख उत्पन्न करनेवाले
  38. आदित्यः – द्वादश आदित्योंमें विष्णुनामक आदित्य
  39. पुष्कराक्षः – कमलके समान नेत्रवाले
  40. महास्वनः – वेदरूप अत्यन्त महान् घोषवाले
  41. अनादिनिधनः– जन्म – मृत्युसे रहित
  42. धाता: विश्वको धारण करनेवाले
  43. विधाता – कर्म और उसके फलोंकी रचना करनेवाले
  44. धातुरुत्तमः – कार्यकारणरूप सम्पूर्ण प्रपंचको धारण करनेवाले एवं सर्वश्रेष्ठ ।
  45. अप्रमेयः – प्रमाणादिसे जाननेमें न आ सकनेवाले
  46. हृषीकेशः – इन्द्रियोंके स्वामी
  47. पद्मनाभः – जगत्के कारणरूप कमलको अपनी नाभिमें स्थान देनेवाले
  48. अमरप्रभुः – देवताओंके स्वामी
  49. विश्वकर्मा– सारे जगत्की रचना करनेवाले
  50. मनुः – प्रजापति मनुरूप
  51. त्वष्टा: संहारके समय सम्पूर्ण प्राणियोंको क्षीण करनेवाले
  52. स्थविष्ठः – अत्यन्त स्थूल
  53. स्थविरो ध्रुवः – अति प्राचीन , एवं अत्यन्त स्थिर
  54. अग्राह्यः – मनसे ग्रहण न किये जा सकनेवाले
  55. शाश्वतः – सब कालमें स्थित रहनेवाले
  56. कृष्णः– सबके चित्तको बलात् अपनी ओर आकर्षित करनेवाले श्यामसुन्दर सच्चिदानन्दमय भगवान् श्रीकृष्ण
  57. लोहिताक्षः – लाल नेत्रोंवाले
  58. प्रतदनः – प्रलयकालमें प्राणियोंका संहार करनेवाले
  59. प्रभूतः – ज्ञान , ऐश्वर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न
  60. त्रिककुब्धाम– ऊपर – नीचे और मध्यभेदवाली
  1. पवित्रम् – सबको पवित्र करनेवाले
  2. मङ्गल: परम्परम मंगल तीनों दिशाअकि आश्रयरूप
  3. ईशानः – सर्वभूतक नियन्ता
  4. प्राणदः – सबको प्राण देनेवाले
  5. प्राण : – सबको जीवित रखनेवाले प्राणस्वरूप
  6. ज्येष्ठ : – सबके कारण होनेसे सबसे बड़े
  7. श्रेष्ठ : – सबमें उत्कृष्ट होनेसे परम श्रेष्ठ
  8. प्रजापतिः – ईश्वररूपसे सारी प्रजाओंके मालिक
  9. हिरण्यगर्भः – ब्रह्माण्ड रूप हिरण्यमय अण्डके भीतर ब्रह्मारूपसे व्याप्त होनेवाले
  10. भूगर्भः – पृथ्वीको गर्भमें रखनेवाले
  11. माधवः – लक्ष्मीके पति
  12. मधुसूदनः– मधुनामक दैत्यको मारनेवाले ।
  13. ईश्वरः – सर्वशक्तिमान् ईश्वर
  14. विक्रमी – शूरवीरतासे युक्त
  15. धन्वी – शार्ङ्गधनुष रखनेवाले
  16. मेधावी – अतिशय बुद्धिमान्
  17. विक्रमः – गरुड पक्षीद्वारा गमन करनेवाले
  18. क्रमः – क्रम विस्तारके कारण
  19. अनुत्तमः – सर्वोत्कृष्ट
  20. दुराधर्षः– किसीसे भी तिरस्कृत न हो सकनेवाले
  21. कृतज्ञः – अपने निमित्तसे थोड़ा – सा भी त्याग किये जानेपर उसे बहुत माननेवाले यानी पत्र – पुष्पादि थोड़ी – सी वस्तु समर्पण करनेवालोंको भी मोक्ष दे देनेवाले
  22. कृतिः– पुरुष प्रयत्नके आधाररूप
  23. आत्मवान् – अपनी ही महिमामें स्थित ।
  24. सुरेशः – देवताओंके स्वामी
  25. शरणम् दीन – दुःखियोंके परम आश्रय
  26. शर्म – परमानन्दस्वरूप
  27. विश्वरेताः – विश्वके कारण
  28. प्रजाभवः – सारी प्रजाको उत्पन्न करनेवाले
  29. अहः – प्रकाशरूप
  30. संवत्सरः – कालस्वरूपसे स्थित
  31. व्यालः – सर्पके समान ग्रहण करनेमें न आ सकनेवाले
  32. प्रत्ययः – उत्तम बुद्धिसे जाननेमें आनेवाले
  33. सर्वदर्शन : – सबके द्रष्टा
  34. अजः – जन्मरहित
  35. सर्वेश्वरः – समस्त ईश्वरोंके भी ईश्वर
  36. सिद्धः – नित्य सिद्ध
  37. सिद्धिः – सबके फलरूप
  38. सर्वादिः – सब भूतोंके आदि कारण
  39. अच्युतः – अपनी स्वरूप – स्थितिसे कभी त्रिकालमें भी च्युत न होनेवाले
  40. वृषाकपिः– धर्म और वराहरूप
  41. अमेयात्मा – अप्रमेयस्वरूप
  42. सर्वयोग विनिःसृतः – नाना प्रकारके शास्त्रोक्त साधनोंसे ट जाननेमें आनेवाले
  43. वसुः – सब भूतोंके वासस्थान तथा सब भूतोंमें बसनेवाले
  44. वसुमनाः – उदार मनवाले
  45. सत्यः – सत्यस्वरूप
  46. समात्मा – ने सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक आत्मारूपसे विराजनेवाले
  47. असम्मितः – समस्त पदार्थोंसे मापे न जा सकनेवाले
  48. समः – सब समय समस्त विकारोंसे रहित
  49. अमोघः – भक्तोंके द्वारा पूजन , स्तवन अथवा स्मरण किये जानेपर उन्हें वृथा न य करके पूर्णरूपसे उनका फल प्रदान करनेवाले
  50. पुण्डरीकाक्षः – कमलके समान नेत्रोंवाले
  51. वृषकर्मा – धर्ममय कर्म करनेवाले
  52. वृषाकृतिः – धर्मकी स्थापना करनेके लिये ने विग्रह धारण करनेवाले ।
  53. रुद्रः – दुःख या दुःखके कारणको सी दूर भगा देनेवाले
  54. बहुशिरा : – बहुत से सिरोंवाले
  55. बभ्रुः – लोकोंका भरण करनेवाले
  56. विश्वयोनिः – विश्वको उत्पन्न करनेवाले
  57. शुचिश्रवाः – पवित्र कीर्तिवाले
  58. अमृतः— कभी न मरनेवाले
  59. शाश्वतस्थाणुः – नित्य सदा एकरस रहनेवाले एवं स्थिर
  60. वरारोह : आरूढ़ होनेके लिये परम उत्तम अपुनरावृत्तिस्थानरूप
  61. महातपाः– प्रताप ( प्रभाव ) रूप महान् तपवाले ।
  62. सर्वगः – कारणरूपसे सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले
  63. सर्वविद्भानुः – सब कुछ जाननेवाले तथा प्रकाशरूप
  64. विष्वक्सेनः– युद्धके लिये की हुई तैयारीमात्रसे ही दैत्य- सेनाको तितर – बितर कर डालनेवाले
  65. जनार्दनः – भक्तोंके द्वारा अभ्युदय- निः श्रेयसरूप परम पुरुषार्थकी याचना किये जानेवाले
  66. वेदः – वेदरूप
  67. वेदवित्: वेद तथा वेदके अर्थको यथावत् जाननेवाले
  68. अव्यङ्गः– ज्ञानादिसे परिपूर्ण अर्थात् किसी प्रकार अधूरे न रहनेवाले सर्वांगपूर्ण
  69. वेदाङ्गः – वेदरूप अंगोंवाले
  70. वेदवित्– वेदोंको विचारनेवाले
  71. कविः – सर्वज्ञ
  72. लोकाध्यक्षः – समस्त लोकोंके अधिपति
  73. सुराध्यक्षः – देवताओंके अध्यक्ष
  74. धर्माध्यक्ष : -अनुरूप फल देनेके लिये धर्म और अधर्मका निर्णय करनेवाले
  75. कृताकृतः – कार्यरूपसे कृत और कारणरूपसे अकृत
  76. चतुरात्मा – सृष्टिकी उत्पत्ति आदिके लिये चार पृथक् मूर्तियोंवाले
  77. चतुर्व्यूहः– उत्पत्ति, स्थिति, नाश और रक्षारूप चार व्यूहवाले
  78. चतुर्दंष्ट्र : – चार दाढोंवाले नरसिंहरूप
  79. चतुर्भुजः – चार भुजाओंवाले वैकुण्ठवासी भगवान् विष्णु ।
  80. भ्राजिष्णुः – एकरस, प्रकाशस्वरूप
  81. भोजनम् – ज्ञानियोंद्वारा भोगनेयोग्य अमृतस्वरूप
  82. भोक्ता – पुरुषरूपसे भोक्ता
  83. सहिष्णुः – सहनशील
  84. जगदादिजः – जगत्के आदिमें हिरण्यगर्भरूपसे स्वयं उत्पन्न होनेवाले
  85. अनघः – पापरहित
  86. विजय : – ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य आदि गुणोंमें सबसे बढ़कर
  87. जेता– स्वभावसे ही समस्त भूतोंको जीतनेवाले
  88. विश्वयोनिः – विश्वके कारण
  89. पुनर्वसुः – पुनः पुनः शरीरों में आत्मरूपसे बसनेवाले ।
  90. उपेन्द्रः – इन्द्रको अनुजरूपसे प्राप्त होनेवाले
  91. वामनः– वामनरूपसे अवतार लेनेवाले
  92. प्रांशुः – तीनों लोकोंको लाँघनेके लिये त्रिविक्रमरूपसे ऊँचे होनेवाले
  93. अमोघः – अव्यर्थ चेष्टावाले
  94. शुचिः – स्मरण , स्तुति और पूजन करनेवालोंको पवित्र कर देनेवाले
  95. ऊर्जितः – अत्यन्त बलशाली
  96. अतीन्द्रः–स्वयंसिद्ध ज्ञान – ऐश्वर्यादिके कारण इन्द्रसे भी बढ़े – चढ़े हुए
  97. संग्रहः – प्रलयके समय सबको समेट लेनेवाले
  98. सर्गः – सृष्टिके कारणरूप
  99. धृतात्मा – जन्मादिसे रहित रहकर स्वेच्छासे स्वरूप धारण करनेवाले
  100. नियमः – प्रजाको अपने – अपने अधिकारोंमें नियमित करनेवाले
  101. यमः – अन्तःकरणमें स्थित होकर नियमन करनेवाले ।
  102. वेद्यः – कल्याणकी इच्छावालोंके द्वारा जाननेयोग्य
  103. वैद्यः – सब विद्याओंके जाननेवाले
  104. सदायोगी– सदा योगमें स्थित रहनेवाले
  105. वीरहा– धर्मकी रक्षाके लिये असुर योद्धाओंको मार डालनेवाले
  106. माधवः – विद्याके स्वामी
  107. मधुः – अमृतकी तरह सबको प्रसन्न करनेवाले ,
  108. अतीन्द्रियः – इन्द्रियोंसे सर्वथा अतीत
  109. महामायः – मायावियोंपर भी माया डालनेवाले महान् मायावी
  110. महोत्साहः – जगत्की उत्पत्ति , स्थिति और प्रलयके लिये तत्पर रहनेवाले परम उत्साही
  111. महाबलः – महान् बलशाली ।
  112. स्वभावसे – शरीरोंमें प्राप्त लेनेवाले , लिये – स्तुति
  113. महाबुद्धिः – महान् बुद्धिमान्
  114. महावीर्यः – महान् पराक्रमी
  115. महाशक्तिः – महान् सामर्थ्यवान्
  116. महाद्युतिः – महान् कान्तिमान्
  117. अनिर्देश्यवपुः – अनिर्देश्य विग्रहवाले
  118. श्रीमान्– ऐश्वर्यवान्
  119. अमेयात्मा: जिसका अनुमान न किया जा सके ऐसे आत्मा वाले
  120. महाद्रिधृक् – अमृतमन्थन और गोरक्षणके समय मन्दराचल और गोवर्धन नामक महान् पर्वतोंको धारण करनेवाले ।
  121. महेष्वासः – महान् धनुषवाले
  122. महीभर्ता– पृथ्वीको धारण करनेवाले
  123. श्रीनिवासः – अपने वक्षःस्थलमें श्रीको निवास देनेवाले
  124. सतां गतिः – सत्पुरुषोंके आश्रयरूप
  125. अनिरुद्धः – सच्ची भक्तिके बिना किसीके भी द्वारा न रुकनेवाले
  126. सुरानन्दः – देवताओंको आनन्दित करनेवाले
  127. गोविन्दः – वेदवाणीके द्वारा अपनेको प्राप्त करा देनेवाले
  128. गोविदां पतिः – वेदवाणीको जाननेवालोंके स्वामी ।
  129. मरीचिः – तेजस्वियोंके भी परम तेजरूप
  130. दमनः – प्रमाद करनेवाली प्रजाको यम आदिके रूपसे दमन करनेवाले
  131. हंसः पितामह ब्रह्माको वेदका ज्ञान करानेके लिये हंसरूप धारण करनेवाले
  132. सुपर्ण : – सुन्दर पंखवाले गरुड- करानेवाले स्वरूप ,
  133. भुजगोत्तमः – सर्पोंमें श्रेष्ठ शेषनागरूप
  134. हिरण्यनाभः– हितकारी और रमणीय नाभिवाले
  135. सुतपाः – बदरिकाश्रममें नर – नारायणरूपसे सुन्दर तप करनेवाले
  136. पद्मनाभः – कमलके समान सुन्दर नाभिवाले
  137. प्रजापतिः – सम्पूर्ण प्रजाओं के स्वामी ।
  138. अमृत्युः – मृत्युसे रहित
  139. सर्वदृक्– सब कुछ देखनेवाले
  140. सिंह : – दुष्टोंका विनाश करनेवाले
  141. सन्धाता – पुरुषोंको उनके कर्मोंके फलोंसे संयुक्त करनेवाले
  142. सन्धिमान्– सम्पूर्ण यज्ञ और तपोंको भोगनेवाले
  143. स्थिरः – सदा एकरूप
  144. अजः – भक्तोंके हृदयोंमें जानेवाले तथा दुर्गुणोंको दूर हटा देनेवाले
  145. दुर्मर्षण : – किसीसे भी सहन नहीं किये जा सकनेवाले
  146. शास्ता – सबपर शासन करनेवाले
  147. विश्रुतात्मा – वेद – शास्त्रों में विशेषरूपसे प्रसिद्ध स्वरूपवाले
  148. सुरारिहा— देवताओंके शत्रुओंको मारनेवाले
  149. गुरुः – सब विद्याओंका उपदेश करनेवाले
  150. गुरुतमः – ब्रह्मा आदिको भी ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाले
  151. धाम- सम्पूर्ण प्राणियोंकी कामनाओंके आश्रय
  152. सत्यः – सत्यस्वरूप
  153. सत्यपराक्रमः – अमोघ पराक्रमवाले
  154. निमिषः– योगनिद्रासे मुदे हुए नेत्रोंवाले
  155. अनिमिषः – मत्स्यरूपसे अवतार लेनेवाले
  156. स्त्रग्वी– वैजयन्ती माला धारण करनेवाले
  157. वाचस्पतिरुदारधीः– सारे पदार्थोंको प्रत्यक्ष करनेवाली बुद्धिसे युक्त समस्त विद्याओंके पति ।
  158. विष्णूसहस्त्रनाम अग्रणीः – मुमुक्षुओंको उत्तम पदपर ले जानेवाले
  159. ग्रामणी : – भूतसमुदायके नेता
  160. श्रीमान्– सबसे बढ़ी – चढ़ी कान्तिवाले
  161. न्यायः -प्रमाणोंके आश्रयभूत तर्ककी मूर्ति
  162. नेता – जगत्रूप यन्त्रको चलानेवाले
  163. समीरणः – श्वासरूपसे प्राणियोंसे चेष्टा करानेवाले
  164. सहस्त्रमूर्धा – -हजार सिरवाले
  165. विश्वात्मा – विश्वके आत्मा
  166. सहस्त्राक्षः – हजार आँखोंवाले
  167. सहस्रपात्– हजार पैरोंवाले ।
  168. आवर्तनः – संसारचक्रको चलानेके स्वभाववाले
  169. निवृत्तात्मा– संसारबन्धनसे मुक्त आत्मस्वरूप
  170. संवृतः – अपनी योगमायासे ढके हुए
  171. सम्प्रमर्दनः – अपने रुद्र आदि स्वरूपसे सबका मर्दन करनेवाले
  172. अहःसंवर्तकः सूर्यरूपसे सम्यक्तया दिनके प्रवर्तक
  173. वह्निः के हविको वहन करनेवाले अग्निदेव
  174. अनिलः – चूर्ण प्राणरूपसे वायुस्वरूप
  175. धरणीधरः – वराह और शेषरूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले ।
  176. सुप्रसादः – शिशुपालादि अपराधियोंपर भी कृपा करनेवाले
  177. प्रसन्नात्मा– प्रसन्न स्वभाववाले ले, अर्थात् करुणा करनेवाले
  178. विश्वधृक् – जगत्को धारण करनेवाले
  179. विश्वभुक् – विश्वको भोगनेवाले अर्थात् विश्वका पालन करनेवाले
  180. विभुः – सर्वव्यापक
  181. सत्कर्ता– भक्तोंका सत्कार करनेवाले
  182. सत्कृतः– पूजितोंसे भी पूजित
  183. साधुः – भक्तोंके कार्य साधनेवाले
  184. जह्रुः – संहारके समय जीवोंका लय करनेवाले
  185. नारायणः – जलमें शयन करनेवाले
  186. नरः भक्तोंको परम धाममें ले जानेवाले ।
  187. असंख्येयः – नाम और गुणोंकी संख्यासे ले , शून्य ,
  188. अप्रमेयात्मा- किसीसे भी मापे न ले जा सकनेवाले
  189. विशिष्ट : – सबसे उत्कृष्ट
  190. शिष्टकृत् – शासन करनेवाले
  191. शुचिः यक्ष | परम शुद्ध
  192. सिद्धार्थ : – इच्छित अर्थको सर्वथा सिद्ध कर चुकनेवाले
  193. सिद्धसंकल्पः – संक्षिप्त महा सत्य संकल्पवाले
  194. सिद्धिदः – कर्म करने वालोंको उनके अधिकारके अनुसार फल देनेवाले
  195. सिद्धिसाधनः – सिद्धिरूप क्रियाके साधक ।
  196. वृषाही– द्वादशाहादि यज्ञोंको अपनेमें ख स्थित रखनेवाले
  197. वृषभ : – भक्तोंके लिये इच्छित प्र वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले
  198. विष्णुः – शुद्ध ई सत्त्वमूर्ति
  199. वृषपर्वा – परम धाममें आरूढ़ होनेकी इच्छावालोंके लिये धर्मरूप सीढ़ियोंवाले
  200. वृषोदरः – अपने उदरमें धर्मको धारण करने वाले
  201. वर्धनः – भक्तोंको बढ़ानेवाले
  202. वर्धमानः – संसाररूपसे बढ़नेवाले
  203. विविक्तः – संसारसे पृथक् रहनेवाले
  204. श्रुतिसागरः – वेदरूप जलके समुद्र ।
  205. सुभुजः – जगत्की रक्षा करनेवाली अति सुन्दर भुजाओंवाले
  206. दुर्धरः– दूसरोंसे धारण न किये जा सकनेवाले पृथ्वी आदि लोकधारक पदार्थोंको भी धारण करनेवाले और स्वयं किसीसे धारण न किये जा सकनेवाले
  207. वाग्मी: वेदमयी वाणीको उत्पन्न करनेवाले
  208. महेन्द्रः ईश्वरोंके भी ईश्वर
  209. वसुदः – धन देनेवाले
  210. वसुः – धनरूप
  211. नैकरूपः अनेक रूपधारी
  212. बृहद्रूपः – विश्वरूपधारी
  213. शिपिविष्टः– सूर्यकिरणोंमें स्थित रहनेवाले
  214. प्रकाशनः – सबको प्रकाशित करनेवाले ।
  215. ओजस्तेजोद्युतिधरः – प्राण बल, शूरवीरता आदि गुण तथा ज्ञानकी दीप्तिको धारण करनेवाले
  216. प्रकाशात्मा – प्रकाशरूप विग्रहवाले
  217. प्रतापनः– सूर्य आदि अपनी और विभूतियोंसे विश्वको तृप्त करनेवाले
  218. ऋद्धः – धर्म , ज्ञान और वैराग्यादिसे सम्पन्न
  219. स्पष्टाक्षरः – ओंकाररूप स्पष्ट अक्षरवाले
  220. मन्त्रः – ऋक् , साम और यजुरूप मन्त्रोंसे जाननेयोग्य
  221. चन्द्रांशुः – संसारतापसे संतप्तचित्त पुरुषोंको चन्द्रमाकी किरणोंके समान आह्लादित करनेवाले
  222. भास्करद्युतिः – सूर्यके समान प्रकाशस्वरूप ।
  223. अमृतांशूद्भवः – समुद्रमन्थन करते समय चन्द्रमाको उत्पन्न करनेवाले समुद्ररूप
  224. भानुः – भासनेवाले
  225. शशबिन्दु : खरगोशके समान चिह्नवाले चन्द्रमाकी तरह सम्पूर्ण प्रजाका पोषण करनेवाले
  226. सुरेश्वरः– देवताओंके ईश्वर
  227. औषधम् – संसाररोगको मिटानेके लिये औषधरूप
  228. जगतः सेतुः – संसारसागरको पार करानेके लिये सेतुरूप
  229. सत्यधर्मपराक्रमः सत्यस्वरूप धर्म और पराक्रमवाले ।
  230. भूतभव्यभवन्नाथः – भूत , भविष्य और वर्तमान सभी प्राणियोंके स्वामी
  231. पवन : वायुरूप
  232. पावनः – दृष्टिमात्रसे जगत्को पवित्र करनेवाले
  233. अनलः – अग्निस्वरूप
  234. कामहा – अपने भक्तजनोंके सकामभावको नष्ट करनेवाले
  235. कामकृत्– भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले
  236. कान्तः – कमनीयरूप
  237. कामः – ( क ) ब्रह्मा , ( अ ) विष्णु , ( म ) महादेव- इस प्रकार त्रिदेवरूप
  238. कामप्रदः – भक्तोंको उनकी कामना की हुई वस्तुएँ प्रदान करनेवाले
  239. प्रभुः – सर्वोत्कृष्ट सर्वसामर्थ्यवान् स्वामी । अति धारण लोकधारक किसीसे
  240. युगादिकृत् – युगादिका आरम्भ करने वाले
  241. युगावर्तः – चारों युगोंको चक्रके समान घुमानेवाले
  242. नैकमायः – अनेकों मायाओंको धारण करनेवाले
  243. महाशनः– कल्पके अन्तमें सबको ग्रसन करनेवाले
  244. अदृश्यः – समस्त ज्ञानेन्द्रियोंके अविषय
  245. व्यक्तरूपः– स्थूलरूपसे व्यक्त स्वरूपवाले
  246. सहस्त्रजित् – युद्धमें हजारों देवशत्रुओंको जीतनेवाले
  247. अनन्तजित्: युद्ध और क्रीडा आदिमें सर्वत्र समस्त भूतोंको जीतनेवाले
  248. इष्ट : – परमानन्दरूप होनेसे सर्वप्रिय
  249. अविशिष्ट– सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित सर्वश्रेष्ठ
  250. शिष्टेष्ट : – शिष्ट पुरुषोंके इष्टदेव
  251. शिखण्डी – मयूरपिच्छको अपना पूर्ण शिरोभूषण बना लेनेवाले
  252. नहुषः – भूतोंको मायासे बाँधनेवाले
  253. वृषः – कामनाओंको करनेवाले
  254. क्रोधकृत्कर्ता– दुष्टोंपर क्रोध करनेवाले
  255. क्रोधहा– क्रोधका नाश करनेवाले और जगत्‌को उनके कर्मोंके अनुसार रचनेवाले
  256. विश्वबाहुः – सब ओर बाहुओंवाले
  257. महीधरः – पृथ्वीको धारण करनेवाले ।
  258. अच्युतः – छ : भावविकारोंसे रहित
  259. प्रथितः – जगत्की उत्पत्ति आदि कर्मोंके कारण
  260. प्राणः – हिरण्यगर्भरूपसे प्रजाको जीवित रखनेवाले
  261. प्राणदः – सबको प्राण देनेवाले
  262. वासवानुजः – वामनावतारमें कश्यपजीद्वारा अदितिसे इन्द्रके अनुजरूपमें उत्पन्न होनेवाले
  263. अपां निधिः – जलको एकत्रित रखनेवाले समुद्ररूप
  264. अधिष्ठानम् – उपादानकारणरूपसे सब भूतोंके आश्रय
  265. अप्रमत्तः – अधिकारियोंको उनके कर्मानुसार फल देनेमें कभी प्रमाद न करनेवाले
  266. प्रतिष्ठितः – अपनी महिमामें स्थित ।
  267. स्कन्दः – स्वामिकार्तिकेयरूप ,
  268. स्कन्दधरः – धर्मपथको धारण करनेवाले
  269. धुर्यः – समस्त भूतोंके जन्मादिरूप धुरको धारण करनेवाले
  270. वरदः – इच्छित वर देनेवाले
  271. वायुवाहनः – सारे वायुभेदोंको चलानेवाले
  272. वासुदेवः – समस्त प्राणियोंको अपनेमें बसानेवाले तथा सब भूतोंमें सर्वात्मारूपसे बसनेवाले , दिव्यस्वरूप
  273. बृहद्धानुः – महान् किरणोंसे युक्त एवं सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करनेवाले
  274. आदिदेव : सबके आदि कारण देव
  275. पुरन्दरः – असुरों के संहारक
  276. अशोकः – सब प्रकारके शोकसे रहित
  277. तारण : – संसारसागरसे तारनेवाले
  278. तारः – जन्म – जरा मृत्युरूप भयसे तारनेवाले
  279. शूरः – पराक्रमी
  280. शौरिः – शूरवीर श्रीवसुदेवजीके पुत्र
  281. जनेश्वरः – समस्त जीवोंके स्वामी
  282. अनुकूलः – आत्मारूप होनेसे अनुकूल
  283. शतावर्तः– धर्मरक्षाके लिये सैकड़ों अवतार लेनेवाले
  284. पद्मी – अपने हाथमें कमल को धारण करनेवाले
  285. पद्मनिभेक्षणः– कमलके समान कोमल दृष्टिवाले । र ले कमलको अपनी नाभिमें
  286. अरविन्दाक्षः– कमलके समान आँखोंवाले पद्मगर्भः – हृदयकमलमें ध्यान करनेयोग्य
  287. शरीरभृत् – अन्नरूपसे सबके शरीरोंका के भरण करनेवाले
  288. महद्भिः – महान् विभूतिवाले
  289. ऋद्धः – सबमें बढ़े – चढ़े
  290. वृद्धात्मा – ले पुरातन आत्मवान्
  291. महाक्षः – विशाल नेत्रोंवाले
  292. गरुडध्वजः – गरुडके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले । ३५५ अतुल : – तुलनारहित , ३५६ शरभः – ले शरीरोंको प्रत्यगात्मरूपसे प्रकाशित करनेवाले , को प्ले , नसे ३५७ भीमः – जिससे पापियोंको भय हो ऐसे भयानक , ३५८ समयज्ञः – समभावरूप यज्ञसे प्राप्त होनेवाले , ३५ ९ हविर्हरिः – यज्ञोंमें हविर्भागको और अपना स्मरण करनेवालोंके पापोंको हरण करनेवाले , ३६० सर्वलक्षणलक्षण्यः – समस्त लक्षणोंसे लक्षित ले होनेवाले , ३६१ लक्ष्मीवान् – अपने वक्षःस्थलमें को लक्ष्मीजीको सदा बसानेवाले , ३६२ समितिञ्जयः – संग्रामविजयी । रूप , ले , ले , बाले ३४६ पद्मनाभः स्थित रखनेवाले , ३४७ रूप , पूर्ण के कसे ले ले ३६३ विक्षरः – नाशरहित , ३६४ रोहितः – मत्स्यविशेषका स्वरूप धारण करके अवतार लेनेवाले , ३६५ मार्गः – परमानन्द प्राप्तिके साधन – स्वरूप , ३६६ हेतुः- संसारके निमित्त और उपादान कारण , ३६७ दामोदरः – यशोदाजीद्वारा रस्सीसे बँधे हुए उदरवाले , ३६८ सहः – भक्तजनोंके अपराधको सहन करनेवाले , ३६ ९ महीधरः- पर्वतरूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले , ३७० महाभागः – महान् भाग्यशाली , ३७१ वेगवान्– तीव्रगतिवाले , ३७२ अमिताशनः सारे विश्वको भक्षण करनेवाले । वीर ३७३ उद्भवः – जगत्की उत्पत्तिके उपादानकारण , वोंके ३७४ क्षोभण : – जगत्की उत्पत्तिके समय प्रकृति के और पुरुषमें प्रविष्ट होकर उन्हें क्षुब्ध करनेवाले , 0100

३७५ देवः – प्रकाशस्वरूप , ३७६ श्रीगर्भः – सम्पूर्ण ऐश्वर्यको अपने उदरगर्भमें रखनेवाले , ३७७ परमेश्वरः – सर्वश्रेष्ठ शासन करनेवाले , ३७८ करणम् – संसारकी उत्पत्तिके सबसे बड़े साधन , ३७ ९ कारणम् जगत्के उपादान और निमित्तकारण , ३८० कर्ता सब प्रकारसे स्वतन्त्र , ३८१ विकर्ता – विचित्र भुवनोंकी रचना करनेवाले , ३८२ गहनः – अपने विलक्षण स्वरूप , सामर्थ्य और लीलादिके कारण पहचाने न जा सकनेवाले , ३८३ गुहः – मायासे अपने स्वरूपको ढक लेनेवाले । ७५२ ३८४ व्यवसाय : – ज्ञानमात्रस्वरूप , ३८५ व्यवस्थानः – लोकपालादिकोंको , समस्त जीवोंको , चारों वर्णाश्रमोंको एवं उनके धर्मोको व्यवस्थापूर्वक रचनेवाले , ३८६ संस्थानः – प्रलयके सम्यक् स्थान , ३८७ स्थानदः – ध्रुवादि भक्तोंको स्थान देनेवाले , ३८८ ध्रुवः – अविनाशी , ३८ ९ परद्धिः – श्रेष्ठ विभूतिवाले , ३ ९ ० परमस्पष्ट : – ज्ञानस्वरूप होनेसे परम स्पष्टरूप , अवतार – विग्रहमें सबके सामने प्रत्यक्ष प्रकट होनेवाले , ३ ९ १ तुष्टः – एकमात्र परमानन्दस्वरूप , ३ ९ २ पुष्ट : – सर्वत्र परिपूर्ण , ३ ९ ३ शुभेक्षण : दर्शनमात्रसे कल्याण करनेवाले । ३ ९ ४ रामः – योगिजनोंके रमण करनेके लिये नित्यानन्दस्वरूप , ३ ९ ५ विरामः- प्रलयके समय प्राणियोंको अपनेमें विराम देनेवाले , ३ ९ ६ विरतः = रजोगुण तथा तमोगुणसे सर्वथा शून्य , ३ ९ ७ मार्गः – मुमुक्षुजनोंके अमर होनेके साधनस्वरूप , ३ ९ ८ नेयः – उत्तम ज्ञानसे ग्रहण करनेयोग्य , ३ ९९ नयः – सबको नियममें रखनेवाले , ४०० अनयः – स्वतन्त्र , ४०१ वीरः – पराक्रमशाली , ४०२ शक्तिमतां श्रेष्ठः शक्तिमानों में भी अतिशय शक्तिमान् ४०३ धर्मः – श्रुतिस्मृति – रूप धर्म , ४०४ धर्मविदुत्तमः – समस्त धर्मवेत्ताओंमें उत्तम । ४०५ वैकुण्ठः परमधामस्वरूप , ४०६ पुरुषः – विश्वरूप शरीरमें शयन करनेवाले , ४०७ प्राणः – प्राणवायुरूपसे चेष्टा करनेवाले , ४०८ प्राणदः

ॐ कारस्वरूप ४१० सम्पूर्ण सर्गके आदिमें प्राण प्रदान करनेवाले , ४० ९ प्रणवः – पृथुः – 1 -विराट् – रूपसे कार्योंको विस्तृत होनेवाले , ४११ हिरण्यगर्भः – ब्रह्मारूपसे प्रकट होनेवाले , ४१२ शत्रुघ्नः – शत्रुओंको मारनेवाले ४१३ व्याप्तः – कारणरूपसे सब करनेवाले ४१४ वायुः – पवनरूप , ४१५ अधोक्षजः अपने स्वरूपसे क्षीण न होनेवाले । व्याप्त [ अनुशासनपर्व , , श्रेष्ठ होनेसे प्रत्यक्ष , ४१६ ऋतुः – कालरूपसे लक्षित होनेवाले ४१७ सुदर्शन : – भक्तोंको सुगमतासे ही दर्शन दे देनेवाले , ४१८ कालः– सबकी गणना करनेवाले , ४१ ९ परमेष्ठी – अपनी प्रकृष्ट महिमामें स्थित रहने के स्वभाववाले , ४२० परिग्रहः – शरणार्थियों द्वारा सब ओरसे ग्रहण किये जानेवाले , ४२१ उग्रः सूर्यादिके भी भयके कारण , ४२२ संवत्सरः – सम्पूर्ण भूतोंके वासस्थान , ४२३ दक्ष : – सब कार्योंको बड़ी कुशलतासे करनेवाले , ४२४ विश्रामः विश्रामकी इच्छावाले मुमुक्षुओंको मोक्ष देनेवाले ४२५ विश्वदक्षिणः – बलिके यज्ञमें समस्त विश्वको दक्षिणारूपमें प्राप्त करनेवाले । ४२६ विस्तारः – समस्त लोकोंके विस्तारके कारण ४२७ स्थावरस्थाणुः – स्वयं स्थितिशील रहकर पृथ्वी आदि स्थितिशील पदार्थोंको अपने में स्थित रखनेवाले , ४२८ प्रमाणम्- ज्ञानस्वरूप होनेके कारण स्वयं प्रमाणरूप , ४२ ९ बीजमव्ययम् – संसार अविनाशी कारण , ४३० अर्थ : -सुखस्वरूप होनेके कारण सबके द्वारा प्रार्थनीय , ४३१ अनर्थः – – पूर्णकाम होनेके कारण प्रयोजनरहित , ४३२ महाकोशः – बड़े महाभोगः – सुखरूप महान् श्रेष्ठः- भोगवाले , ४३४ महाधन – यथार्थ और अतिशय धनस्वरूप । खजानेवाले , ४३३ ४३५ अनिर्विण्णः – उकताहटरूप विकारसे रहित , ४३६ स्थविष्ठः – विरारूपसे स्थित , ४३७ अभू : – अजन्मा , ४३८ धर्मयुपः – धर्मके स्तम्भरूप , ४३ ९ महामख : – अर्पित किये हुए यज्ञोको निर्वाणरूप महान् फलदायक बना देनेवाले ,

अनुशासनपर्व ४४० नक्षत्रनेमिः – समस्त नक्षत्रोंके केन्द्रस्वरूप ४४१ नक्षत्री- चन्द्ररूप , ४४२ क्षमः- समस्त कार्योंमें जानेपर परमात्मभावसे स्थित , ४४४ समीहन : समर्थ , ४४३ क्षामः – समस्त विकारोंके क्षीण हो • सृष्टि आदिके लिये भलीभाँति चेष्टा करनेवाले । ४४५ यज्ञः – सर्वयज्ञस्वरूप , ४४६ इज्य : – पूजनीय ४४७ महेज्य : —सबसे अधिक उपासनीय , ४४८ क्रतुः – यूपसंयुक्त यज्ञस्वरूप , ४४ ९ सत्रम् सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेवाले , ४५० सतां गतिः – सत्पुरुषोंके परम प्रापणीय स्थान , ४५१ सर्वदर्शी समस्त प्राणियोंको और उनके कार्योंको देखनेवाले ४५२ विमुक्तात्मा – सांसारिक बन्धनसे रहित आत्मस्वरूप ४५३ सर्वज्ञः – सबको जाननेवाले , ४५४ ज्ञानमुत्तमम् – सर्वोत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप । ४५५ सुव्रतः – प्रणतपालनादि श्रेष्ठ व्रतोंवाले ४५६ सुमुखः – सुन्दर और प्रसन्न मुखवाले ४५७ सूक्ष्मः – अणुसे भी अणु ४५८ सुघोष : – सुन्दर और गंभीर वाणी बोलनेवाले ४५ ९ सुखदः – अपने भक्तोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले , ४६० सुहृत् – प्राणिमात्रपर अहैतुकी दया करनेवाले परम मित्र , ४६१ मनोहर : – अपने रूपलावण्य और मधुर भाषणादिसे सबके मनको हरनेवाले ४६२ जितक्रोधः – क्रोधपर विजय करनेवाले अर्थात् अपने साथ अत्यन्त अनुचित व्यवहार करनेवालेपर भी क्रोध न करनेवाले , ४६३ वीरबाहुः – अत्यन्त पराक्रमशील भुजाओंसे युक्त , ४६४ विदारणः अधर्मियोंको नष्ट करनेवाले । १४६५ स्वापन : – प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंको • अज्ञाननिद्रामें शयन करानेवाले , ४६६ स्ववश : – स्वतन्त्र , ४६७ व्यापी आकाशकी भाँति सर्वव्यापी , ४६८ नैकात्मा- प्रत्येक युगमें लोकोद्धारके लिये अनेक रूप धारण करनेवाले , ४६ ९ नैककर्मकृत्- जगत्की उत्पत्ति , स्थिति और प्रलयरूप तथा भिन्न- भिन्न अवतारोंमें मनोहर लीलारूप अनेक कर्म करनेवाले , ४७० वत्सरः – सबके निवासस्थान , ४७१ वत्सलः –

VISHNU BHAGWAN KE 1000 NAAM, 1000 NAAM

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