लोक निगम क्या है?  इसके उद्देश्य, विशेषताएँ, प्रकार, लाभ तथा हानियों पर प्रकाश डालिए । Lok Nigam kya hai? What is Corporation in Hindi

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lok nigam kya hai

लोक निगम का अर्थ एवं परिभाषाएँ ‘

लोक निगम का अर्थ एवं परिभाषाएँ ‘ निगम ‘ को अंग्रेजी में कॉर्पोरेशन कहा जाता है । निगम ‘ का अर्थ – निरन्तर चलते रहने वाला व्यापारिक संगठन है । लोक से अभिप्राय जनता से है । अत : लोक निगम अथवा सार्वजनिक निगम की स्थापना लोक हित की दृष्टि से की जाती है ।

ये संगठन जनता की भलाई के लिए सरकार द्वारा चलाये जाते हैं । इन निगमों को व्यावसायिक निगमों के समान ही चलाया जाता है । इनका अस्तित्व कानून द्वारा निर्धारित होता है और इसे एक बड़ी सीमा तक वित्तीय स्वतन्त्रता प्राप्त होती है ।

फिफनर के अनुसार , “ निगम एक ऐसा निकाय है , जिसे अनेक व्यक्तियों के ‘ एक व्यक्ति के रूप में कार्य करने के लिए स्थापित किया जाता है । 

विलियम जे . ग्रेन्ज के शब्दों में , ” निगम एक कृत्रिम व्यक्ति है , जिसको कानून द्वारा किन्हीं विशेष गतिविधियों तथा कार्यों को करने का अधिकार है । ” 

डिमोक के अनुसार, ‘ सरकारी निगम वह सरकारी उद्यम है जिसकी स्थापना किसी निश्चित व्यापार को चलाने अथवा स्थानीय उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए संघीय , राज्य अथवा स्थानीय कानून के द्वारा की गई है । 

अर्नेस्ट डेविस के अनुसार , ” निश्चित शक्तियों तथा कार्यों और वित्तीय स्वतन्त्रता सहित सार्वजनिक शक्ति द्वारा उत्पन्न निगम संयुक्त मण्डल है ।

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि निगम का निर्माण एक विशेष प्रक्रिया द्वारा किया जाता है । यह जनहित के कार्य करने के लिए कानूनी मान्यता प्राप्त संगठन है ।

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लोक निगमों के उद्देश्य लोक निगमों का निर्माण निम्नलिखित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है

  1. साख बढ़ाने के लिए ।
  2. किसी प्रदेश विशेष के बहुयामी विकास के लिए ।
  3. औद्योगिक , व्यापारिक या अन्य किसी कार्य के लिए ।

लोक निगम की विशेषताएँ लोक निगम की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

  1. लोक निगमों में समस्त पूँजी सरकार ही लगाती है । अत : इन पर सरकार का पूर्ण स्वामित्व होता है ।
  2. लोक निगमों का निर्माण संसद द्वारा पारित विशेष अधिनियम द्वारा होता है । इस अधिनियम में इन निगमों के अधिकारों , दायित्वों , कार्य क्षेत्रों तथा प्रबन्ध व संचालन सम्बन्धी नियमों आदि का वर्णन किया जाता है ।
  3. लोक निगमों का पृथक वैधानिक अस्तित्व होता है । ये अन्य पर तथा अन्य इन पर वाद प्रस्तुत कर सकते हैं । ये निगम अनुबन्ध भी कर सकते हैं ।
  4. लोक निगम वित्तीय मामलों में पूरी तरह स्वतन्त्र होते हैं ।
  5. लोक निगम संसदीय व कार्यपालिका के नियन्त्रण से एक बड़ी सीमा तक स्वतन्त्र रहते हैं ।
  6. लोक निगम को वित्तीय मामलों के साथ – साथ प्रशासनिक मामलों में भी स्वायत्तता प्राप्त होती है ।
  7. लोक निगम को अपने उद्योग अथवा वाणिज्य में एकाधिकार होता है और किसी निजी उद्योग से उसको प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ता है ।
  8. लोक निगम अपने कर्मचारियों की भर्ती , पदोन्नति , पदावनति आदि के सम्बन्ध में पूरी तरह से स्वतन्त्र होते हैं ।
  9. लोक निगमों की स्थापना एक विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जाती है ।
  10. लोक निगम का प्रबन्ध एक प्रबन्ध मण्डल द्वारा होता है , जिसकी नियुक्ति सम्बन्धित मन्त्री करता है । यह मण्डल अधिनियम की सीमाओं के अन्दर प्रबन्ध तथा संचालन सम्बन्धी नियम – उपनियम बनाता है ।
  11. लोक निगमों का मूल उद्देश्य सेवा होता है । यद्यपि ये वाणिज्यिक प्रकृति के होते हैं , फिर भी लाभ कमाना इनका गौण उद्देश्य होता है ।

लोक निगमों के प्रकार लोक निगमों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जा सकता है

  1. कानूनी निगम :- जिन लोक निगमों का निर्माण संसद के किसी कानून द्वारा होता है , उन्हें कानूनी निगम कहते हैं । ये निगम अपने दैनिक प्रशासन एवं आन्तरिक प्रशासन में बहुत स्वतन्त्र होते हैं। इनके मामलों में कार्यपालिका कम से कम हस्तक्षेप करती है। उदाहरणार्थ – भारतीय जीवन बीमा निगम , दामोदर घाटी निगम
  2. कानूनोत्तर निगम – वे निगम , जिनका निर्माण कार्यपालिका के आदेशानुसार होता है , कानूनोत्तर निगम कहलाते हैं । इन पर कार्यपालिका का विशेष नियन्त्रण रहता है । उदाहरणार्थ – स्वामित्व तथा नियन्त्रण की दृष्टि से लोकनिगमों को निम्न तीन भागों में बाँटा जा सकता है
  • वे निगम जिनका स्वामित्व पूर्णतः तथा आंशिक रूप से सरकार के हाथों में होता है । ऐसे निगमों पर सरकार का ही नियन्त्रण रहता है । ये निगम ही सही अर्थ में सरकारी निगम होते हैं । जैसे – राज्य व्यापार निगम , जीवन बीमा निगम आदि । 
  • वे निगम जिन पर पूँजी तो सरकार लगाती है लेकिन उन पर गैर सरकारी नियन्त्रण होता है , उन्हें मिश्रित निगम कहते हैं । जैसे – अन्तर्राष्ट्रीय वित्त निगम आदि ।
  • वे निगम , जिनमें सरकार न तो पूँजी लगाती है और न ही प्रतिनिधित्व रखती है , इनकी स्थापना निजी व्यवसायियों के द्वारा व्यक्तिगत लाभ के उद्देश्य से की जाती है , इन्हें गैर – सरकारी निगम कहते हैं । जैसे – टाटा आयरन तथा स्टील कॉरपोरेशन , ओबराय होटल्स , आदि ।

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लोक निगमों के लाभ अथवा उपयोगिता

लोक निगम के प्रमुख लाभ अथवा उपयोगिता निम्न प्रकार हैं
  • लोक निगम अपने कार्य संचालन में सरकारी विभागों के नियमों से बँधे नहीं होते हैं अत : वे अपने कार्य अधिक तीव्रता से कर सकते हैं ।
  • लोक निगमों के कारण आर्थिक क्षेत्र में दक्षता तथा मितव्ययिता उत्पन्न होती है ।
  • लोक निगमों के संचालन एवं प्रबन्ध की व्यवस्था सरकारी प्रबन्ध से पृथक् होती है अतः ये राजनीतिक दबाबों से मुक्त होते हैं ।
  • लोक निगमों का संचालन निजी उद्योगों की भाँति किया जाता है , जिससे दक्षता हो जाती है । प्राप्त कर्मचारियों को बहुत प्रोत्साहन मिलता है । उन्हें शीघ्र ही पदोन्नति एवं वेतन वृद्धि प्राप्त
  • लोक निगमों द्वारा सरकार को व्यापारिक क्षेत्र में प्रत्यक्ष रूप से प्रविष्ट हुए बिना अपनी आर्थिक नीतियों को क्रियान्वित करने का अवसर प्राप्त हो जाता है ।

लोक निगमों से हानियाँ

 

लोक निगमों से हानियाँ लोक निगमों से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं

  • लोक निगमों का प्रयोग औद्योगिक व व्यापारिक कार्यों तक ही सीमित है ।
  • लोक निगमों की धन सम्बन्धी स्वतन्त्रता की भी आलोचना की जाती है ।
  • लोक निगमों से सरकार में अनेक बार क्षेत्राधिकार की समस्या बनी रहती है ।
  • लोक निगमों की नीतियों का निर्धारण मन्त्रियों द्वारा किया जाता है , जो अक्सर उनके बीच संघर्ष का कारण बन जाता है ।
  • लोक निगमों के संचालक मण्डलों में सरकारी अधिकारियों की उपस्थिति से कार्यपालिका का हस्तक्षेप बढ़ जाता है ।

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