बोर्ड अथवा आयोग से क्या अभिप्राय है ? बोर्डों अथवा आयोग के प्रकार तथा गुण – दोषों का वर्णन कीजिए । What is Board or Commission?

बोर्ड अथवा आयोग | Board Athva Ayog- यदि विभाग के निदेशन तथा निरीक्षण का उत्तरदायित्व कई व्यक्तियों में विभाजित कर दिया जाता है तो उसे मण्डल अथवा आयोग प्रणाली का संगठन कहा जाता है । भारत में इसके सुप्रसिद्ध उदाहरण रेलवे बोर्ड तथा केन्द्रीय राजस्व बोर्ड हैं । 

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BOARDS

 

रेलों के प्रशासन , प्रबन्ध एवं संचालन का सभी कार्य रेल मन्त्री के अधीन किसी एक व्यक्ति द्वारा न होकर , अनेक सदस्यों वाले एक रेलवे बोर्ड द्वारा किया जाता है । यही स्थिति केन्द्रीय वित्त मन्त्रालय में आय- कर तथा सीमा शुल्क के विभागों को नियन्त्रित करने वाले केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड तथा केन्द्रीय उत्पादन शुल्क बोर्ड की है । राज्यों में इसी प्रकार राजस्व , बिजली , शिक्षा आदि के बोर्ड बने हुए हैं जो अपने विभागों के अधिकतर कार्यों का नियन्त्रण करते हैं ।

इंग्लैण्ड में उद्योग , व्यापार , यातायात विभागों की अध्यक्षता मण्डलों द्वारा की जाती है । संयुक्त राज्य अमेरिका में राज्य सरकारों तथा स्थानीय स्वशासन के क्षेत्र में मण्डल पद्धति बहुत लोकप्रिय है जहाँ राज्यों में स्कूल बोर्ड , सार्वजनिक स्वास्थ्य बोर्ड आदि विभिन्न प्रकार के बोर्ड पाए जाते हैं । बोर्ड बहुल पद्धति का एक अन्य रूप आयोग पद्धति है । भारत में इसका सर्वोत्तम उदाहरण संघ तथा राज्यों के लोक सेवा आयोग हैं । हाल ही में निर्वाचन आयोग तथा केन्द्रीय सतर्कता आयोग को भी बहुसदस्यीय बना दिया गया है ।

बोर्ड अथवा आयोग के प्रकार | Type of Board And Commission

बोर्ड या आयोग निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

विनियामक आयोग- Regulatory Commission

संयुक्त राज्य अमरीका में विनियामक आयोग अर्ध – विधायी तथा अर्ध – न्यायिक कार्यों का सम्पादन करते हैं ।

प्रशासनिक बोर्ड- Administrative Board

जहाँ किसी विभाग का अध्यक्ष बोर्ड हो तो उसे प्रशासनिक बोर्ड कहा जाता है , जैसे— सीमा शुल्क बोर्ड , केन्द्रीय उत्पादन शुल्क बोर्ड , रेलवे बोर्ड आदि । 

सलाहकार बोर्ड- Advisory Board

इस बोर्ड को प्रायः विभाग के अध्यक्ष के साथ सम्बद्ध किया जाता है ताकि यह उसे सामान्य या विशिष्ट मामलों में सलाह दे सके । सलाहकार बोर्ड में प्रायः तकनीकी विशेषज्ञ सम्मिलित किए जाते हैं । ये विभाग के पदक्रम संगठन से बाहर होते हैं तथा नीति बनाने का उनका कोई दायित्व नहीं होता है । भारत में लोक सेवा आयोग , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग , शिक्षा का केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड आदि इसके उदाहरण हैं ।

पदसोपान में सम्मिलित बोर्ड– HIERARCY RELATED BOARDS

कई बार कोई बोर्ड अथवा आयोग मध्यवर्ती स्तर पर पदक्रम में व्यवस्थित होते हैं । इसे विभाग चलाने की शक्ति तो नहीं दी जाती किन्तु इसे सौंपे गए विशिष्ट क्षेत्र में यह अर्ध – विधायी तथा अर्ध – न्यायिक कार्य करता है , उदाहरणार्थ स्कूल बोर्ड आंशिक रूप से शिक्षा विभाग के साथ सम्बन्धित रहते हैं , बिजली बोर्ड बिजली वितरण का कार्य करते हैं ।

बोर्ड अथवा आयोग प्रणाली के गुण | Qualities of Board or Commission

बोर्ड अथवा आयोग प्रणाली के निम्नलिखित गुण हैं 

दलीय राजनीति का प्रभाव कम –

मण्डल अथवा आयोग का एक गुण यह है कि इसमें दलीय राजनीति का प्रभाव कम रहता है । इसका प्रमुख कारण यह है कि इसमें समस्त प्रमुख दलों को प्रतिनिधित्व दे दिया जाता है ।

बाहरी दबावों से कम प्रभावित

बहुल अध्यक्ष प्रणाली बाह्य दबावों से कम प्रभावित रहती है । उदाहरणार्थ , यदि लोक सेवा आयोग एक – सदस्यीय हो , तो उन्हें बाह्य दबावों से बचाना असम्भव हो जाएगा । किन्तु बहु – सदस्यीय होने के कारण उनमें यह दोष अपेक्षाकृत कम मात्रा में पाया जाता है । 

अर्ध – न्यायिक कार्यों के लिए उपयुक्त –

मण्डलीय अथवा आयोग पद्धति की अध्यक्ष प्रणाली उन मामलों में अधिक उपयोगी होती हैं , जहाँ व्यक्तिगत हितों को प्रभावित करने वाली स्वविवेकात्मक अथवा नियामक शक्ति प्रयोग में लायी जाती है , जैसे- रिजर्व बैंक की बैंकिंग नीति का निर्धारण ।

कार्य करने से पहले पर्यालोचन सम्भव-

मण्डलीय अथवा बहुल विभागाध्यक्ष पद्धति उन विभागों के लिए उपयुक्त समझी जाती है , जिनमें अपनायी जाने वाली नीति अथवा प्राविधियाँ पूर्णतया निश्चित नहीं होतीं तथा जिनमें उनकी शोध करने एवं उनका निर्माण करने के लिए चिन्तन और चर्चा की उपेक्षा होती है । यही कारण है कि शिक्षा , व्यापार , राजस्व आदि के संगठन में बहुल अध्यक्ष प्रणाली का आश्रय लिया जाता है |

विरोधी हितों में समन्वय उत्पन्न करने में सहायक

बहुल विभागाध्यक्ष प्रणाली का प्रयोग उन मामलों में किया जाता है जहाँ दो अथवा दो से अधिक विरोधी हितों के मध्य निर्णय करना होता है अथवा उनके मध्य सामंजस्य की स्थापना करनी होती है । उदाहरणार्थ , दुर्घटनाओं की स्थिति में श्रमिकों को दिये जाने वाले मुआवजे के विषय में निर्णय लेना । ऐसे मामलों में पूँजीपति और श्रमिकों के हितों के मध्य संघर्ष उत्पन्न हो जाता है और एकल अध्यक्ष की अपेक्षा बहुल निकाय दोनों पक्षों का अधिक विश्वास प्राप्त कर सकता है ।

बोर्ड अथवा आयोग प्रणाली के दोष | Cons of Board or Commision

बोर्ड अथवा आयोग प्रणाली के निम्नलिखित दोष हैं 

स्वार्थों का बोलबाला –

मण्डल में अनेक वर्गों का प्रतिनिधित्व होता है । मण्डल अथवा आयोग के निर्णय चाहे कितने ही श्रेष्ठ क्यों न हों , वे एक प्रकार से समझौता निर्णय होते हैं । ये निर्णय परस्पर विरोधी हितों में समझौता होने के कारण इनके टूटने का खतरा बना रहता है ।

गुटबन्दी को प्रोत्साहन –

मण्डल अथवा आयोग के अन्दर दल अथवा गुट बन जाते हैं और वे दल व गुट सारे कार्य को अवरुद्ध कर देते हैं ।

आदेश की एकता का अभाव-

बहुल अध्यक्ष व्यवस्था के परिणामस्वरूप प्रशासन में एक प्रकार का विघटन आ जाता है और संगठन में आदेश की एकता का अभाव है और न ही उस पर प्रभावशाली नियन्त्रण रखा जा सकता है । पाया जाता है । इसके परिणामस्वरूप प्रशासन द्वारा न तो कुशल निर्देशन ही किया जा सकता

अनुशासनहीनता को बढ़ावा-

एक व्यक्ति जब सर्वोच्च अधिकारी होता है तो उसके आदेश को चोटी से लेकर नीचे तक के कर्मचारी स्वीकार करते हैं , पर जब अनेक व्यक्ति अधिकारी बन जाते हैं तो निर्देशों में सर्वमान्यता का अभाव हो जाता है । मण्डल के निर्णय अधिकांश बहुमत से होते हैं , अल्पमत वाले उन निर्णयों के प्रति उदासीन होते हैं । इससे टोली की भावना कम हो जाती है और प्रशासन में अनुशासनहीनता आ जाती है ।
What is Board/MEANING OF BOARD

दुर्बल एवं विलम्बकारी व्यवस्था-

मण्डल अथवा आयोग प्रणाली का अध्यक्ष कमजोर होता है तथा कार्यकारी दृष्टि से उसके कारण देरी भी लगती है । वह एकल विभागाध्यक्ष की भाँति न तो इतनी तीव्रता से निर्णय ले सकता है और न इतनी कुशलता से । परस्पर विचार – विनिमय एवं चर्चाओं में बहुत अधिक समय व्यय हो जाता है ।

उत्तरदायित्व का निश्चय कठिन-

जब किसी संगठन या विभाग की अध्यक्षता किसी मण्डल अथवा आयोग को सौंपी जाती है तो यह कठिन हो जाता है कि गलत नीतियों तथा अकुशलता के लिए किसी को निश्चित रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सके ।
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