पृथ्वी की आंतरिक संरचना | Earth’s Internal  Structure | UPSC HINDI

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पृथ्वी की बाह्य स्थलाकृतियाँ उसकी आंतरिक संरचना से घनिष्ठ सम्बंध रखती हैं । 

पृथ्वी की आंतरिक संरचना

यद्यपि पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अध्ययन मुख्यतः भूगर्भशास्त्र का विषय है , परंतु स्थलीय स्थलाकृतियों के विश्लेषण के लिए भूगोल में भी इसका अध्ययन किया जाता है । 

चूँकि आंतरिक भाग मानव के लिए दृश्य नहीं है , अत : इसके सम्बंध में जानकारी प्रायः अप्रत्यक्ष स्रोत से ही प्राप्त हो सकी है । 

वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी के लिए निम्न स्रोतों को आधार बनाया है । 

पृथ्वी की आंतरिक संरचना सम्बंधी स्रोत . 

  1. अप्राकृतिक स्रोत   

  • घनत्व आधारित स्रोत  
  • दाब आधारित स्रोत 
  • ताप आधारित 

2. पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बंधी स्रोत 

3.प्राकृतिक स्रोत

  • ज्वालामुखी आधारित स्रोत
  • उल्का पिंडों से प्राप्त साक्ष्य
  • भूकम्पीय तरंगों पर आधारित स्रोत 

 अप्राकृतिक साधन ( Artificial Sources ) 

1 . घनत्व ( Density ) 

पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है जबकि भू – पर्पटी ( Crust ) का घनत्व लगभग 3.0 है । 

इस आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि पृथ्वी का क्रोड़ ( अन्तरतम ) का औसत घनत्व 5.5 से अधिक होगा । साधारण तौर पर यह घनत्व 11 माना जाता है , जो जल से 7 से 8 गुना भारी है । 

इससे स्पष्ट है कि आंतरिक भागों में घनत्व की अधिकता होगी । घनत्व सम्बंधी विभिन्न प्रमाणों से यह पता चलता है कि पृथ्वी के क्रोड़ ( Core ) का घनत्व सर्वाधिक है । 

2 . दबाव ( Pressure )

क्रोड़ ( Core ) के अधिक घनत्व के सम्बंध में चट्टानों के भार व दबाव का संदर्भ लिया जा सकता है । यद्यपि दबाव बढ़ने से घनत्व बढ़ता है , किन्तु प्रत्येक चट्टान की अपनी एक सीमा है जिससे अधिक इसका घनत्व नहीं हो सकता है , चाहे दबाव कितना ही अधिक क्यों न कर दिया जाए । तात्पर्य यह है कि आंतरिक भाग की चट्टानें अधिक घनत्व वाली भारी धातुओं से बनी हैं । 

3. तापक्रम ( Temperature ) 

सामान्य रूप से प्रत्येक 32 मीटर की गहराई पर तापमान में 1 ° C की वृद्धि होती है , परंतु बढ़ती गहराई के साथ तापमान की वृद्धि दर में भी गिरावट आती है । प्रथम 100 किमी . की गहराई में प्रत्येक किमी . पर 12 ° C की वृद्धि होती है । 

उसके बाद के 300 किमी . की गहराई में प्रत्येक किमी . पर 2 ° C एवं उसके पश्चात् प्रत्येक किमी . की गहराई पर 1 ° C की वृद्धि होती है । विवर्तनिक रूप से सक्रिय क्षेत्रों में तापमान अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है । पृथ्वी के आंतरिक भाग से ऊष्मा का प्रवाह बाहर की ओर होता रहता है , जो तापीय संवहन तरंगों के रूप में होता है । प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के द्वारा यह और भी स्पष्ट हो गया है । 

2. प्राकृतिक साधन ( Natural Sources ) 

ज्वालामुखी क्रिया 

ज्वालामुखी उद्गार से निकलने वाला तप्त व तरल मैग्मा के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी की गहराई में कहीं न कहीं ऐसी परत अवश्य है जो तरल या अर्द्धतरल अवस्था में है । इसी को मैग्मा भंडार ( Magma Chamber ) कहा गया है । यद्यपि ज्वालामुखी के उद्गार से भी पृथ्वी की आंतरिक बनावट के सम्बंध में कोई निश्चित जानकारी नहीं मिल पाती है । 

2 . भूकम्प विज्ञान के साक्ष्य 

भूकम्प विज्ञान वह विज्ञान है , जिसमें भूकम्पीय लहरों का सिस्मोग्राफ यंत्र ( Seismograph ) द्वारा अंकन कर अध्ययन किया जाता है । यह ऐसा प्रत्यक्ष साधन है , जिससे पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध होती है । Prithvi ki Antarik sanrachna

3 . उल्का पिंडों से प्राप्त साक्ष्य 

उल्का पिंड वे ठोस संरचनाएँ हैं , जो स्वतंत्र रूप से अंतरिक्ष में तैर रही हैं । कभी – कभी पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव क्षेत्र में आने पर ये पिंड पृथ्वी से टकरा जाते हैं । पृथ्वी पर गिरने के दौरान अत्यधिक घर्षण की वजह से उल्का पिंडों की बाहरी परत नष्ट हो जाती है और आंतरिक भाग अनावृत्त हो जाता है । उनके केन्द्रीय भाग में पाये जाने वाले भारी पदार्थों के संघटन के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अनुमान लगाया गया है । 

पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बंधित सिद्धांतों के साक्ष्य 

ग्रहाणु परिकल्पना जहाँ पृथ्वी के अंतरतम् ( क्रोड़ ) को ठोस मानती है , वहीं ज्वारीय परिकल्पना

एवं वायव्य निहारिका परिकल्पना में पृथ्वी के अन्तरतम को तरल माना गया है । इस प्रकार पृथ्वी के आंतरिक भाग के सम्बंध में दो ही संभावना बनती हैं , कि या तो यह ठोस हो सकती है या तरल । 

पृथ्वी का रासायनिक संगठन एवं विभिन्न परतें 

International Union of Geodesy and Geophysics ( IUGG ) के शोध के आधार पर , पृथ्वी के आंतरिक भाग को तीन वृहद् मंडलों में विभक्त किया गया है , जो निम्न हैं 

1. भू – पर्पटी ( Crust )

IUGG ने इसकी औसत मोटाई 30 किमी . मानी है यद्यपि अन्य स्रोतों के अनुसार क्रस्ट की मोटाई 100 किमी . बताई गई है । भूकम्पीय लहरों की गति में अन्तर के आधार पर भू – पर्पटी को दो उपविभागों में बांटा गया है- 

  • ऊपरी क्रस्ट एवं 
  • निचली क्रस्ट । | 

UGG के अनुसार , क्रस्ट के ऊपरी भाग में ‘ P ‘ लहर की गति 6.1 किमी . प्रति सेकेंड तथा निचले भाग में 6.9 किमी . प्रति सेकेंड है । ऊपरी क्रस्ट का औसत घनत्व 2.7 एवं निचले क्रस्ट का 3.0 है । घनत्व में यह अंतर दबाव के कारण माना जाता है । ऊपरी क्रस्ट एवं निचले क्रस्ट के बीच घनत्व सम्बंधी यह असंबद्धता कोनराड असंबद्धता कहलाती है । क्रस्ट का निर्माण मुख्यतः सिलिका और एल्युमिनियम से हुआ है । अतः इसे सियाल ( SIAI ) परत भी कहा जाता है । 

2. मैंटल ( Mantle ) 

क्रस्ट के निचले आधार पर भूकंपीय लहरों की गति में अचानक वृद्धि होती है तथा यह बढ़कर 7.9 से 8.1 किमी . प्रति सेकेंड तक हो जाती है । इससे निचले क्रस्ट एवं ऊपरी मेंटल के मध्य एक असंबद्धता ( Discontinuity ) का निर्माण होता है , जो चट्टानों के घनत्व में परिवर्तन को दर्शाता है । 

इस असंबद्धता की खोज 1909 ई . में रूसी वैज्ञानिक ए.मोहोरोविकिक ( A. Mohorovicic ) ने की । इसीलिए इसे मोहो – असंबद्धता ( Moho – Discontinuity ) भी कहा जाता है । मोहो – असंबद्धता से लगभग 2,900 किमी , की गहराई तक मेंटल का विस्तार है । 

इसका आयतन पृथ्वी के कुल आयतन ( Volume ) का लगभग 83 % एवं द्रव्यमान ( Mass ) का लगभग 68 % है । मेंटल का निर्माण मुख्यतः सिलिका और मैग्नीशियम से हुआ है । इसलिए इसे सीमा ( SiMa ) परत भी कहा जाता है । 

मेंटल को IUGG ने भूकंपीय लहरों की गति के आधार पर पुनः तीन भागों में बाँटा है

  1. मोहो असंबद्धता से 200 किमी . 
  2. 200 किमी . से 700 किमी . 
  3. 700 किमी . से 2,900 किमी . 

ऊपरी मेंटल में 100 से 200 किमी . की गहराई में भूकंपीय लहरों की गति मंद ( 7.8 किमी . प्रति सेकेंड ) पड़ जाती है । इसलिए इस भाग को निम्न गति का मंडल ( Zone of Low velocity ) भी कहा जाता है । 

ऊपरी मेंटल एवं निचले मेंटल के बीच घनत्व सम्बंधी यह असंबद्धता रेपेटी असंबद्धता कहलाती है । 

दुर्बलता मंडल ( Asthenosphere ) को मैग्मा चैंबर भी कहते हैं क्योंकि यह पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाले ज्वालामुखी के मैग्मा की आपूर्ति करता है दुर्बलता मंडल ( Asthenosphere ) पर स्थलमंडल ( 3.09 cm ‘ ) उत्प्लावित ( तैर रहा ) है क्योंकि दुर्बलतामंडल का घनत्व 4.5g / cm ‘ तक प्राप्त होता है । 

इसे निम्न गति क्षेत्र ( Low velocity zone ) भी कहते हैं । यहाँ भूकंपीय तरंगों ( Seismic wave ) में मंदन ( Deceleration ) उत्पन्न होते हैं । prithvi ki antarik sanrachna in hindi

3. क्रोड़ ( Core ) 

निचले मैंटल के आधार पर ‘ p ‘ तरंगों की गति में अचानक परिवर्तन आता है तथा यह बढ़कर 13.6 किमी . प्रति सेकेंड हो जाती है । यह चट्टानों के घनत्व में एकाएक परिवर्तन को दर्शाता है , जिससे एक प्रकार की असंबद्धता उत्पन्न होती है । 

इसे गुटेनबर्ग – विशार्ट असंबद्धता भी कहते हैं ।

गुटेनबर्ग असंबद्धता से लेकर 6,371 किमी . की गहराई तक के भाग को क्रोड़ कहा जाता है । 

इसे भी दो भागों में बाँटकर देखते हैं 

  • 2,900 से 5,150 किमी . और 
  • 5,150-6,371 किमी .। 
  • इन्हें क्रमश : बाह्य अंतरतम एवं 
  • आंतरिक अंतरतम ( क्रोड़ ) कहते हैं । 

इनके बीच पाई जाने वाली घनत्व सम्बंधी असंबद्धता लैहमेन असंबद्धता कहलाती है । 

क्रोड़ में सबसे ऊपरी भाग में घनत्व 10 होता है , जो अंदर जाने पर 12 से 13 तथा सबसे आंतरिक भागों में 13.6 हो जाता है । इस प्रकार क्रोड़ का घनत्व मैंटल के घनत्व के दोगुने से भी अधिक होता है । 

बाह्य अंतरतम में 5 तरंगें प्रवेश नहीं कर पाती हैं । तुलनात्मक दृष्टि से अधिक तरल होने के कारण P तरंगों की गति 11.23 किमी . प्रति सेकेंड रह जाती है । 

यद्यपि अत्यधिक तापमान के कारण क्रोड़ को पिघली हुई अवस्था में रहना चाहिए किन्तु अत्यधिक दबाव के कारण यह अर्द्धतरल या प्लास्टिक अवस्था में रहता है । 

क्रोड़ का आयतन पूरी पृथ्वी का मात्र 16 % है , परंतु इसका द्रव्यमान पृथ्वी के कुल द्रव्यमान का लगभग 32 % है । क्रोड़ के आंतरिक भागों में यद्यपि सिलिकन की भी कुछ मात्रा रहती है , परंतु इसका निर्माण मुख्य रूप से निकेल और लोहा से हुआ है । अतः इसे नीफे ( NiFe ) परत भी कहते हैं । 

इस समय बाह्य क्रोंड़ में सिलिकन की मात्रा 20 प्रतिशत तथा लोहे एवं निकेल की मात्रा 80 प्रतिशत है । 

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